ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 3
पाठ का परिचय (Introduction):
यह कविता 'कुरुक्षेत्र' (Kurukshetra) नामक प्रसिद्ध प्रबंधकाव्य से ली गई है। महाभारत के युद्ध के बाद शान्तिपर्व में पितामह भीष्म युधिष्ठिर को यह उपदेश देते हैं कि जब तक समाज में समानता और न्याय (Equality and Justice) स्थापित नहीं हो जाता, तब तक सच्ची शांति नहीं आ सकती। यह कविता मानवतावाद (Humanism) और समाजवाद (Socialism) का बहुत गहरा संदेश देती है कि ईश्वर ने यह धरती सबके लिए बनाई है और इसके संसाधनों पर सबका समान अधिकार है।
शब्दार्थ: धर्मराज = युधिष्ठिर; क्रीत = खरीदी हुई (Bought); दासी = नौकरानी (Slave); जन्मना = जन्म से; परस्पर = आपस में; समीरण = हवा (Air); मुक्त प्रकाश = बिना रोक-टोक की धूप/रोशनी; आशंकाओं = डर/भय (Fears)।
प्रसंग: भीष्म पितामह युधिष्ठिर (धर्मराज) को समझा रहे हैं कि इस धरती पर सभी का जन्म से समान अधिकार है।
व्याख्या: भीष्म कहते हैं कि हे युधिष्ठिर! यह धरती किसी व्यक्ति विशेष की खरीदी हुई नौकरानी (गुलाम) नहीं है जो केवल उसी के आदेश माने। इस धरती पर जन्म लेने वाले सभी मनुष्य प्राकृतिक रूप से एक समान हैं। उनमें कोई ऊँच-नीच नहीं है। प्रकृति सबको मुफ्त और बिना किसी भेदभाव के धूप (प्रकाश) और हवा (समीरण) देती है। इसी तरह समाज के हर इंसान को यह हक़ है कि उसे अपना जीवन बिना किसी बाधा (Burdens/Obstacles) के विकास करने का अवसर मिले और उसका जीवन हर प्रकार के डर (आशंकाओं) से मुक्त हो।
शब्दार्थ: विघ्न = रुकावटें/बाधाएँ (Obstacles); पथ = रास्ता; पर्वत = बड़े पहाड़/बड़ी मुश्किलें; न्यायोचित सुख = न्याय से प्राप्त होने वाला सुख/अधिकार (Rightful Happiness); सुलभ = आसानी से मिलना; भव = संसार (World)।
प्रसंग: इस पद्यांश में कवि कहते हैं कि जब तक समाज में न्याय नहीं होगा, तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती।
व्याख्या: भीष्म कहते हैं कि यद्यपि सभी मनुष्य समान हैं, फिर भी अभी समानता के इस रास्ते (पथ) पर बहुत सारी रुकावटें (विघ्न) मौजूद हैं। स्वार्थ, भेदभाव और अमीरी-गरीबी के बड़े-बड़े पहाड़ मानवता के विकास का रास्ता रोक कर खड़े हैं। जब तक इस धरती के हर एक मनुष्य को उसका प्राकृतिक और न्यायोचित हक़ (रोटी, कपड़ा, मकान) आसानी से नहीं मिल जाता, तब तक इस संसार (भव) में कभी भी चैन या सच्ची शांति नहीं आ सकती। अन्याय के बीज से कभी शांति का पौधा नहीं उगता।
शब्दार्थ: मनुज (Manuj) = मनुष्य/इंसान; सुख-भाग = सुख का हिस्सा/बँटवारा; सम (Sam) = समान (Equal); शमित (Shamit) = शांत; कोलाहल = शोर/अशांति (Turmoil); संचय = इकट्ठा करना (Hoarding); विकीर्ण (Vikirn) = फैले हुए/बिखरे हुए (Scattered); तुष्ट (Tusht) = संतुष्ट (Satisfied)।
प्रसंग: कवि ने स्वार्थी मनुष्यों को फटकारते हुए बताया है कि यदि वे संसाधनों का बँटवारा समान रूप से करें, तो यह धरती भी स्वर्ग जैसी बन सकती है।
व्याख्या: भीष्म पितामह कहते हैं कि जब तक समाज के हर इंसान को सुख और संसाधनों
(Resources/Wealth) में समान हिस्सा (बराबरी का हक़) नहीं मिलेगा, तब तक समाज का शोर-शराबा, अशांति (कोलाहल) और
वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) कभी कम या शांत नहीं होगा। मनुष्य इस बात को भूल गया है। वह स्वार्थी होकर आपस में
ही संदेह और डर में जी रहा है। वह केवल अपने और अपने परिवार के लिए धन और सुख-सुविधाएँ इकट्ठा (संचय) करने में
लगा हुआ है।
वे आगे कहते हैं कि ईश्वर (प्रभु) ने इस धरती पर इतनी अधिक प्राकृतिक संपदा (जल, अन्न, खनिज) बिखेर रखी है कि
यदि उसका सही बँटवारा हो, तो धरती के सभी लोग अपना पेट भर सकते हैं (संतुष्ट हो सकते हैं)। इतने भी लोग नहीं हैं
जो धरती के पूरे संसाधनों को समाप्त कर दें। यदि मनुष्य स्वार्थ और 'संग्रह करने की प्रवृत्ति' को छोड़ दे, तो
वह इसी पल इस दुखी धरती को 'स्वर्ग' (जहाँ समान सुख और शांति हो) के समान सुंदर बना सकता है।
प्रश्न 1: "यह भूमि किसी की नहीं क्रीत है दासी।" इस पंक्ति के माध्यम से कवि क्या समझाना चाहते हैं?
उत्तर: भीष्म पितामह युधिष्ठिर (धर्मराज) को समझाते हुए कहते हैं कि यह धरती किसी व्यक्ति विशेष (अमीर या शक्तिशाली) की खरीदी हुई दासी (नौकरानी) नहीं है कि केवल वह इसका मनचाहा उपभोग करे। यह धरती ईश्वर द्वारा बनाई गई है और इस पर जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य का इस धरती के जल, वनस्पति और सुख-साधनों (हवा, प्रकाश) पर जन्म से समान अधिकार है। कोई भी जन्म या संपत्ति के आधार पर दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं है।
प्रश्न 2: कवि के अनुसार संसार में शांति क्यों नहीं है और संघर्ष कब कम होगा?
उत्तर: कवि के अनुसार संसार में शांति इसलिए नहीं है क्योंकि यहाँ
'न्यायोचित सुख' सबको समान रूप से (सुलभ) नहीं मिल रहे हैं। समाज में स्वार्थ और भेदभाव के बड़े-बड़े पहाड़
अड़े हुए हैं। शक्तिशाली और अमीर लोग प्राकृतिक संसाधनों पर अपना एकाधिकार (Control) जमाए बैठे हैं और
गरीबों का शोषण कर रहे हैं।
समाज में कोलाहल और वर्ग-संघर्ष (Conflict) तभी कम होगा जब "मनुज-मनुज का सुख-भाग सम होगा"—यानी जब समाज के
हर गरीब व कमज़ोर व्यक्ति को उसका न्यायपूर्ण हिस्सा और अधिकार मिलेगा। जब तक अन्याय रहेगा, तब तक संघर्ष कम
नहीं हो सकता।
प्रश्न 3: हम इस धरती को 'स्वर्ग' कैसे बना सकते हैं?
उत्तर: कवि का मानना है कि ईश्वर ने इस धरती पर इतनी प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संपदा (अन्न, जल, धन) फैलाई हुई है कि यदि उसका समान वितरण (Distribution) किया जाए तो धरती के सभी लोग संतुष्ट (तुष्ट) हो सकते हैं। आज मनुष्य केवल अपने स्वार्थ के लिए धन का 'संचय' (Hoarding/Gathering) करने में लगा हुआ है, जिससे दूसरा भूखा रहता है। यदि मनुष्य अपने स्वार्थ, लालच और संग्रह की प्रवृत्ति को छोड़ दे और संसाधनों को सभी के साथ समान रूप से बाँटकर जिए, तो इसी क्षण यह अशांत धरती भी प्रेम और सुख वाले 'स्वर्ग' में बदल जाएगी।